Sunday, August 06, 2017

दल-बदल राजनीति का एक और युग | Another era of party-changing politics

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इस समय भारतीय राजनीति में इस्तीफों का दौर अपने चरम विन्दु पर है जोकि निश्चित तौर पर हैरान कर देने वाला है I हाल ही में गुजरात और इससे पहले दिल्ली, गोवा तथा उत्तर प्रदेश में भी इसका असर देखने मिला I इन इस्तीफों में ज्यादातर राजनीति के दिग्गज चेहरे शामिल थे यही नहीं 2013 से अब तक विभिन्न न्यायालयों द्वारा एक दर्जन के आसपास सांसदों तथा विधायकों को अयोग्य घोषित किया गया जिसमे तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता से लेकर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव जैसे राजनीति के प्रकांड विद्वान शामिल थे I 

 

इस तरह की बढ़ती गतिविधियां कहीं हमारे विशाल लोकतन्त्र के लिए खतरा तो नहीं ? क्या भारत के लगभग 81.5 करोड़ मतदाताओं को और अधिक परिपक्क होने आवश्यकता है ? जिससे आम आदमी के मत का प्रयोजन किसी जाति, धर्म और सम्प्रदाय के परे हो I 90 के दशक में भी कमोबेश इसी तरह की राजनीति का बोलबाला था जब हरयाणा के एक विधायक गयाराम ने एक दिन में तीन दलों में अदला-बदली की जिसे "आयाराम गयाराम" की संज्ञा दी गयी थी I

मौजूदा परिदृश्य में लगभग सभी राजनितिक दल सह-मात का खेल खेलने में व्यस्त दिखाई पड़ते हैं उनका असली प्रयोजन तथा दायित्व शायद वे भूल चुके हैं I सिर्फ व्यक्तिगत लाभ की राजनीति हर तरफ देखने को मिल रही है लगभग प्रत्येक सत्तारूढ़ दल अपने पसंदीदा सहयोगी राजनितिक दलों के दागी नेताओं को राजनितिक मैदान में बनाये रखने के लिए सार्वजनिक तथा स्वतंत्र संस्थाओं का भरपूर उपयोग करने से भी बाज नहीं आते और किन्ही कारणों से विधेयक अगर पास नहीं भी हो पाता है तो अध्यादेश का रास्ता चुना जाता है फिर जनता को मूर्ख बनाने के लिए उस अध्यादेश को चुनावी रैलियों में जनता के सामने फाड़ दिया जाता है और सिर्फ चुनावी फायदे के लिए सम्मानीय संस्थाओं तथा पदों की मर्यादाओं को सार्वजनिक जगह पर बड़ी ही फूहड़ता के साथ कुचल दिया जाता है

हम बात कर रहे हैं उस जनप्रीतिनिधित्व अधिनियम 1951 की जिसे 22 जुलाई 2013 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रस्तुत कर संशोधन की मंजूरी दी थी, यह उच्चतम न्यायलय के उस निर्णय को निष्प्रभावी करने के लिए लाया गया था जिसमे कहा गया था कि "किसी भी न्यायालय में दोषी ठहराए गए सांसद विधायक संसद विधान मंडल की कार्यवाही में भाग नहीं ले सकते I" इस तरह के संविधान संशोधन विधेयक बिना किसी शोर शराबे के सभी राजनितिक दलों द्वारा अभूतपूर्व एकता का परिचय देते हुए पास कर लिए जाते हैं वहीँ लोकपाल जैसे महत्वपूर्ण विधेयक को पास हुए लगभग तीन साल हो जाने के बाद भी उसमे कुछ जरुरी संशोधन की वजह से आज तक लोकपाल कि नियुक्ति नहीं हो पायी हैं और ही निकट भविष्य में इसकी कोई सम्भावना नज़र रही हैं क्योंकि इसमें जनता का हित तथा उसके प्रति जवाबदेही सुनिश्चित की जाएगी

जनता के सिपहलेसार युवान्मुखी नीति योजनाओं पर बहस करने के बजाय संसद में मोबलिंचिंग की घटनाओं पर बिना मतलब तथा गैरजरूरी हंगामा, शोरशराबा कर रहे हैं जबकि प्रशाशनिक व्यवस्था का विषय पूर्णतया राज्य सूचि से सम्बंधित हैं I कोई जलते हुए जम्मू कश्मीर पर बहस नहीकरना चाहता हैं जहाँ इंसानियत तथा मानवता का रोज कत्ल किया जाता है, जहाँ लोकतन्त्र सालों से सिसकियाँ भर रहा है I कोई उन सैनिकों के लिए अत्याधुनिक हथियारों तकनिकी के विषय पर बहस नहीं करना चाहता है जो माइनस 50 डिग्री तापमान में बंदूक थामकर हर घंटे सीने पर आतंकियों की गोलियां और अपनों के पत्थर झेलने के लिए तैयार हैं I जिन गरीब किसानों को केंद्र में रखकर चुनावी रणनीति का तानाबाना बुना जाता हैं वे पिछले 70 सालों से अबतक बद से बदतर जिंदगी जीने के लिए मजबूर हैं I 
 
आज भारतीय राजनीति में जनता का प्रतिनिधित्व करने के सारे पैरामीटर बदल चुके हैं I अब तक सेवादारी का जामा पहनकर कुछ तथाकथित सफेदपोशों ने केवल जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धज़्ज़ियाँ उड़ाई हैं फलस्वरूप .डी. सी.बी.आई. का डर उन्हें विपक्ष की एकता और अखंडता को बचाये रखने में असमर्थता प्रदान कर रहा है तथा उनका दागदार व्यक्तित्व ही उनकी मुसीबतों का कारण है I एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म की एक रिपोर्ट के मुताबिक 16वीं लोकसभा के लिए चुने गए 441 में से 186 (34%) सदस्यों ने अपने चुनावी हलफनामें में हत्या, बलात्कार, सांप्रदायिक हिंसा जैसे आपराधिक मामलों का खुलासा किया है जो निश्चित तौर पर हमारे लोकतन्त्र के लिए चिंताजनक विषय हैं

अंत में मेरा व्यक्तिगत मत हैं कि माननीय उच्चतम न्यायालय तथा चुनाव आयोग को इस विषय पर मंथन करना चाहिए कुछ जरुरी बदलाव की दिशा में उचित कदम उठाने चाहिए जिससे राजनितिक दलों की जनता के  प्रति जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके एवं एंटी डिफेक्शन लॉ जैसा कठोर कानून लाने की जरुरत हैं जिससे भारतीय राजनीति में स्थिरता सुनिश्चित की जा सके I 


About Author: 

I Hemant Pratap Singh from Indore. as per as my academic qualification completed my graduation with political science & my professional cum technical qualification is Certified Industrial Accountant from The Institute of Computer Accountant (ICA) with advance computer accountancy. I'm working with an manufacturing company as Accountant on part time basis & I'm aspirants of Indian Administrative Service.

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