Thursday, January 26, 2017

मंजिल कामयाबी की | A Motivational short story

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सफल व्यक्ति के पीछे असफलता का दर्द छिपा होता है यही असफलता का मुकाम आगे चलकर सफलता के दरवाजे खोलता है |यह एक ऐसे इन्सान की दास्ताँ है जिसने सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़कर एक ऐसा मुकाम हासिल किया जहाँ पहुंचना आसान नहीं होता, यदि हमारा लक्ष्य निश्चित है तो कामयाबी की मंजिल दूर नहीं होती |

मंजिल कामयाबी की manzil kamyabi ki - a motivational story


एक गाँव में एक लड़का था उसके तीन भाई थे अपने तीनों भाइयों में प्रतीक सबसे छोटा था बड़ा भाई खेती करता था दूसरा भाई गाँव-गाँव में फेरी लगाकर परिवार का पालन पोषण करता था और तीसरा भाई पढाई कर रहा था | तीनों भाइयों में बहुत ही प्यार था, दोनों बड़े भाई कमाकर के अपने छोटे भाई को पढ़ा रहे थे | वो चाहते थे कि हमारा भाई हम लोगो की तरह न बनकर एक अच्छी सरकारी नौकरी करे और शहर में घर बसाये |
जब प्रतीक चार साल का था तब उसकी माँ का और कुछ समय बाद उसके पिता का देहांत हो गया था | दोनों बड़े भाइयों ने मिलकर के माँ और बाप दोनों का फ़र्ज़ अदा किया | उसे किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं होने दी |प्रतीक ने बीएससी और एमएससी की पढाई करके एसएससी की तैयारी की ओर कदम बढ़ाये |

परिवार के सभी लोग अशिक्षित थे इसलिए उचित मार्गदर्शन की कमी उसे खल रही थी| सबसे पहले प्रतीक ने क्लर्क की भर्ती परीक्षा लखनऊ में जाकर दी | जब वह परीक्षा कक्ष से वापस लौट रहा था तो उसकी मुलाकात एक ऐसे शख्स से हुई जो देखने में तो बहुत रौबीला और कठोर मालूम पड़ता था लेकिन बातचीत से ऐसा लगा की जैसे वह अत्यंत नरम ह्रदय वाला व्यक्ति हो |उसने मुझसे कई मुद्दों पर बात की और परीक्षा कैसी हुई बेटा यह बड़े प्यार से पूंछा |

मैंने उन्हें कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया क्यूंकि यह मेरी पहली प्रतियोगी परीक्षा थी जो मैंने उचित मार्गदर्शन के अभाव में दी थी |पता नहीं क्यों,इस शख्स से बातचीत करके मुझे ऐसा लगा जैसे अब कामयाबी की मंजिल मुझसे ज्यादा दूर नहीं है | मैं अपने भाइयों के सपनों को तोड़ना नहीं चाहता था वरन साकार करना चाहता था |

केंद्र से बाहर निकलकर वह मुझे अपनीं गाड़ी में बैठाकर अपने घर ले गये और चाय-पानी कराया और बाद में  खाना खिलाया और फिर कहा “बेटा तुम बहुत थक गये होगे जाओ कमरे में जाकर थोड़ी देर आराम कर लो ‘’| लेकिन मुझे नींद कहाँ आने वाली थी मैं तो दी हुई परीक्षा के हल के बारे में सोच रहा था |क्यों मेरा पेपर खराब हो गया,क्या मैं अपने भाइयों की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाउँगा | इसी उधेड़ बुन में मैं अधजगा सा बेड पर लेटा हुआ था कि एकाएक दरवाजे की कुण्डी बजी ,मैं सहम सा गया देखा वही देवता समान शख्स मेरे सामने खड़े थे ,उन्हें मेरी नब्ज टटोलने में जरा भी देर नहीं लगी कि मैं इस बक्त क्या सोच रहा हूँ | वह आकर मेरे पास बैठ गये ,पीठ पर हाथ फिराया और बोले बेटा डरो मत,इस परीक्षा में यदि तुम्हें असफलता मिलती है तो यही असफलता तुम्हें आगे चलकर सफलता के कदम चूमनें के लिए प्रोत्साहित करेगी |

इस परीक्षा का परिणाम लगभग दो महीने बाद घोषित हुआ लेकिन मैं असफल हो गया | मैं बिल्कुल निराश नहीं हुआ  बल्कि इसी सोच के साथ असफलता ही हमे सिखाती है ,दिन –दूनी रात चौगुनी मेहनत करना शुरू कर दिया |कुछ समय बाद एस .बी .आई. के क्लर्क पद के लिए परीक्षा दी और इस बार मैं सफल हो गया |

क्लर्क पद पाकर के मेरे भाइयों को तो अपार ख़ुशी मिली लेकिन मुझे मानसिक संतुष्टि नहीं मिली |अपने भाइयों के कहने पर मैंने bank में join कर लिया |पर ना जाने क्यूँ मेरा मन bank में नौकरी पाकर के खुश नहीं था | मैंने मन ही मन दृढ निश्चय किया कि इस औसत दर्जे की नौकरी को छोड़कर कठिन परिश्रम द्वारा मैं उच्च दर्जे की नौकरी प्राप्त करके रहूँगा | सारे दिन bank में duty करने के बाद रात को आकर मैं आगे की परीक्षा की तैयारी में जुट जाता | ऐसे मैंने कई सरकारी नौकरियों के लिए apply किया ,सफलता अर्जित की पर मेरा मन तो सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़कर सबसे ऊपर की मंजिल पर पैर रखना चाहता था|


लगभग तीन साल बाद मैंने लोक सेवा आयोग की पी .सी .एस परीक्षा में एक विशेष rank के साथ सफलता प्राप्त की | अपने शुरूआती दौर में मैं भले ही असफल रहा था लेकिन यही असफलता का दर्द मेरे लिए सफलता का मुकाम बना |दोनों भाइयों के स्नेह ,लगन और सरकारी नौकरी दिलाने की निष्ठा ने मुझे मेरी मंजिल दिखाई |

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