Tuesday, January 24, 2017

एक साया गरीब का | Ek Saya Gareeb Ka | An Inspirational Hindi Short Stories

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Dosto, Gyanitota me aapka swagat hai, aaj hum aapke liye ek inspirational short story lekar aaye hain, mera vishwas hai ki aapko ye zaroor pasand aayegi.

inspirational short stories


जीवन एक बढ़ता हुआ स्वरुप,बढती हुई राहें डगमगाते हुए कदम जाने कब थमकर अपनी मंजिल धीरे धीरे पार करने लगते हैं,न आखो में रोशनी है और ना कोई झलक बस बरसात की आंधी लिए तूफ़ान से लड़कर वही आदमी शान्तचित्त होकर खतरों से लड़ने के लिए बाहें तो समेटता है लेकिन न जाने क्यों चढ़ता हुआ अंधकार उन्हें लक्ष्य से रोक लेता है , लगाम लगा लेता है उन विशाल भुजाओ पर जिन्हें समेटता हुआ वह आगे बढ़ने की सोचता है |

अभागा सा वह जीवन हिचकिचाकर काँप जाता है चलते हुए कदमो को रोक देता है ऊपर मुख किये लाचार होकर कुछ सोचने लगता है यह जीवन कोई हरामखोर रईसजादा नहीं वरन उस गरीब माई का बेटा है जो दो जून की रोटी कमाकर खाती है इस दो जून की रोटी के लिए कोठी के मालिकों की हजारों जली कटी सुनकर अपने नहीं वरन जीवन का पेट भरती है| जब यह जीवन छोटा था तो शायद अपनी माँ की हर वास्तविकता से अनजान था |

इस गरीब माई की नन्ही सी जान को बीएस खाने खेलने से मतलब था और मस्त था ,कई बर्ष बीत गए उसने ये जानने की कोशिश तक नहीं की कि माँ उसका पेट किस तरह से भरती है |माँ ने भी उसे अपनी परेशानी से दूर रखा व कभी अवगत नहीं कराया | यह बूढ़ी माई अपने लाडले को बचपन से ही कठोरता पूर्वक यातनाओं से जूझने नहीं देना चाहती थी ,क्यों उसे डर लगता था उन अनबूझ पहेलियों से जो कभी-कभी सपनों में आकर उसे डराया करती थीं |

समय बढ़ने लगा, समय के साथ-साथ जीवन दिन पर दिन बड़ा होने लगा और अब समझदारी उसके दिमाग में घुसकर उसे कुछ सिखाने के लिए प्रेरित करने लगी| रोशन निगाहें हट्टा-कट्टा शरीर चाँद सा मुख सब कुछ तो था उसके पास यदि कमी थी तो सिर्फ पैसे की,सम्मान की और बिरादरी की| तसल्ली मिलती जब उसकी वही बूढ़ी माँ उसे ह्रदय से लिपटकर अपने आँचल में सहेज लेती किन्तु दुःख होता जब वही माँ आँचल में उसे छिपाए हुए विस्म्रतियों में तल्लीन हो जाती,कुछ कहना चाहती किन्तु मन गवाही नहीं देता की वह लाडले को परेशान करे |

यह जीवन बड़ा अजीब लगता है पर वह कर भी क्या सकता था| वह समाज से भिड़ने के लिए सीना फुलाता तो था लेकिन उसकी आर्थिक परिस्थितियां उसे मजबूर कर देतीं, क्यों आज पैसे और भ्रष्टाचार का बोलबाला है आज बिना लिए-दिए होता ही क्या है | गरीब आदमी ही बिकता है उसे खरीदने वाले समाज के बड़े आदमी , जमींदार , उद्योगपति और नेता हैं |बिना विरादरी के बिना पैसे के इस बालक का दुनियां में सहयोग करने वाला था ही कौन| इसके पास भण्डार नहीं था उस भ्रष्ट कमाई का जो वह दुनियां से लड़ने के लिए संगठन करता और खरीदता उन लोगों को जो पैसे के लिए अपना ईमान तक बेंच देते हैं |

 प्रातः काल सूरज उदय होता है और वह अपनी लालिमा से सारे जग को रोशन कर देता है | किरणें रवि के चारों ओर फैलकर अपने प्रकाश को बिखेर देती है ,केवल पृथ्वी पर नहीं वरन पृथ्वी पर रहनें वाले प्रत्येक सजीव और निर्जीव प्राणियों पर जो इस धरातल पर रहकर उदय होती लालिमा से कुछ सीखना संवरना चाहते हैं लेकिन अस्त होती हुई संध्या फिर उसके अंदर अभाव और निर्धनता के विचारों को भर देती है |

अभाव क्या उसके अंदर हर बस्तु का अभाव ही था ऐसे में खैर वह अपने आप को कैसे तसल्ली देता, कैसे यकीन कराता अपनी उस बूढ़ी माँ को जो उसके लिए एक सहारा और वह उसके लिए एक अंधे की लकड़ी के समान था |उसकी आँखों का चमकीला तारा था, वह १ तारा और अपनी बिरादरी का एकमात्र कुलदीपक जो दुनियां में रोशनी तो बिखेरना चाहता था लेकिन बाटी डालते ही लौ में घी सूख जाता था ऐसे में वह अपने को कुछ पल अपने को थका हुआ बोझिल इंसान और संसार के लिए खुद को एक कलंकित अभागा समझता | सहसा उसी पल वह पुनः अपनी सारी कमजोर शक्ति बटोरकर फिर उसी दुनिया में लग जाता है यह सोचकर इंसान को दीर्घ जीवन जीना है उसे आनंद को अपनाना ही होगा | फिर जीवन अपने तनाव को डोर कर थके हुए शरीर और अवयवो को ताज़गी देकर कुछ पल परिस्थितियों को समझता और फिर अपनी भावनाओं को और संवेगो को उत्तेजित कर अपना सब कुछ दांव पर लगाने के लिए तत्पर हो जाता है |

मंजार ,चमन ,घाटी सब खिले-खिले नजर आ रहे हैं | ढलती हुई संध्या ने अपना रुख बदल लिया है चारो ओर शांति ही शांति है | बस कहीं-कहीं पर उल्लुओं की आवाज शंकालु प्रतीत हो रही है | आसमां आवाज लगा रहा है मनो वह उषाकाल होने के लिए सचेत कर रहा हो और रट रहा हो की जागो मनुष्य जागो,हे मानव चिरनिद्रा से जागो और जकड़े हुए आलस्य को त्याग कर अपने कार्य में लग जाओ जो तुम्हें सुख प्रदान करने वाला है | उगते हुए सूरज ने अपनी रश्मियों को चारो तरफ बिखेर दिया है | बाग़ बगीचे,खेत खलिहानों में रोशनी बिखरते ही हलचल मच गयी है |किसानों ने अपनी धीमी चाल को तेज कदमों के साथ बढ़ाना शुरू कर दिया है |मंद-मंद पवन जैसे गति पकड़ रही है वैसे-वैसे स्म्रतियों में खोये हुए जीवन की तीव्रता बढती जा रही है| ऊषा का आगमन खिलता हुआ सूरज दौड़ते हुए किसान धीमी गति के साथ अपनी चाल को बढाती हुई हवाएं मानो ये सभी उसे सन्देश देकर उसके गदगदाए हुए सीने को पुलकित कर रहे हैं |

थमा हुआ सफ़र फिर आगे बढ़ने की सोचता है,जमा हुआ खून गर्म होकर बहने लगता है काफी असमंजस और जद्दोजहद की स्थिति के बीच वो खुद को समाज से लड़ने के लिए प्रेरित करता है |

दुनियां मुझे बेसहारा,लाचार से कुछ भी कहती रहे और मैं हाथ पर हाथ धरे कायरों की भांति बैठा रहूँ | दौलत,बाप और खानदान के अलावा मेरे पास सब कुछ तो है|ईश्वर ने मुझे दो हाथ,दो पैर,दो आँखे,नाक,कान किसलिए दिए हैं खुद को गड्ढे में धकेलनें के लिए या उन्नति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए, इस संसार में जिस का बाप न हो उसे जीवन जीने का अधिकार नहीं है| क्या उसे सिर्फ और सिर्फ रईसों के यहाँ नौकरी करने और उनकी चमचागिरी करने के लिए और उनके बारे में प्रशंसा के पुल बांधने के लिए भेजा गया|हा फिर मैं अनाथ भी तो नहीं हूँ,मैं अपनी बूढ़ी माँ और खुद का स्वतंत्रतापूर्वक मेहनत करके पेट नहीं भर सकता जीवन खुद में एक प्रयोगशाला है खुदा वास्ते यहाँ लोग आते है, प्रयोग करते हैं लेकिन सिद्ध करना भूल जाते है | सिद्धिकरण से पहले ही वे इस रंगमंच में अपना-अपना किरदार निभा कर चले जाते है |संसार रुपी गर्त में अन्धकाररुपी पहले डूबती नज़र आती है किन्तु बाद में तैरने लगती है लेकिन प्रकाश से भरी नौका तैरकर डूब जाती है | अज्ञान की तक्षशिला संसार को सींच देती है लेकिन ज्ञान का स्वरुप कहीं-कहीं अपनी छींटे मारता है |


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